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धूर्त बिल्ली का न्याय - काकोलुकियम - पंचतंत्र

धूर्त बिल्ली का न्याय -  काकोलुकियम - पंचतंत्र  एक जंगल में विशाल वृक्ष के तने में एक खोल के अन्दर कपिंजल नाम का तीतर रहता था । एक दिन वह तीतर अपने साथियों के साथ बहुत दूर के खेत में धान की नई-नई कोंपलें खाने चला गया। बहुत रात बीतने के बाद उस वृक्ष के खाली पडे़ खोल में ’शीघ्रगो’ नाम का खरगोश घुस आया और वहीँ रहने रहने लगा। कुछ दिन बाद कपिंजल तीतर अचानक ही आ गया । धान की नई-नई कोंपले खाने के बाद वह खूब मोटा-ताजा हो गया था । अपनी खोल में आने पर उसने देखा कि वहाँ एक खरगोश बैठा है । उसने खरगोश को अपनी जगह खाली करने को कहा । खरगोश भी तीखे स्वभाव का था; बोला ----"यह घर अब तेरा नहीं है । वापी, कूप, तालाब और वृक्ष के घरों का यही नियम है कि जो भी उनमें बसेरा करले उसका ही वह घर हो जाता है । घर का स्वामित्व केवल मनुष्यों के लिये होता है , पक्षियों के लिये गृहस्वामित्व का कोई विधान नहीं है ।" झगड़ा बढ़ता गया । अन्त में, कर्पिजल ने किसी भी तीसरे पंच से इसका निर्णय करने की बात कही । उनकी लड़ाई और समझौते की बातचीत को एक जंगली बिल्ली सुन रही थी। उसने सोचा, मैं ही पंच ब...

कौवे और उल्लू का बैर - काकोलुकीयम् - पंचतंत्र

कौवे और उल्लू का बैर - काकोलुकीयम् - पंचतंत्र एक बार हंस, तोता, बगुला, कोयल, मोर, चातक, कबूतर, उल्लू आदि सब पक्षियों ने सभा करके यह सलाह की कि उनका राजा वैनतेय केवल वासुदेव की भक्ति में ही लगा रहता है। व्याधों से उनकी रक्षा का कभी कोई उपाय नहीं करता। इसलिये पक्षियों का कोई दूसरा राजा चुन लिया जाय । कई दिनों की बैठक के बाद सभी पक्षियों ने एक सम्मति से सर्वाङग सुन्दर उल्लू को राजा चुन लिया । अभिषेक की तैयारियाँ होने लगीं, विविध तीर्थों से पवित्र जल मँगाया गया, सिंहासन पर रत्‍न जड़े गए, स्वर्णघट भरे गए, मङगल पाठ शुरु हो गया, ब्राह्मणों ने वेद पाठ शुरु कर दिया, नर्तकियों ने भी नृत्य की पूरी तैयारी कर लीं; कुछ ही क्षणों में उलूकराज राज्यसिंहासन पर विराजमान होने ही वाले थे कि कहीं से एक कौवा वहां आ गया । कौवे ने सोचा कि यह समारोह कैसा ? यह उत्सव किस उपलक्ष्य में ? पक्षियों ने भी कौवे को देखा तो आश्चर्य में पड़ गए । उसे तो किसी ने बुलाया ही नहीं था । भिर भी, उन्होंने सुन रखा था कि कौआ सब से चतुर कूटराजनीतिज्ञ पक्षी है। ...

अभागा बुनकर - मित्रसम्प्राप्ति - पंचतंत्र | the unlucky weaver panchatantra story in hindi

अभागा बुनकर - मित्रसम्प्राप्ति - पंचतंत्र  प्राचीन समय की बात है। एक नगर में सोमिलक नाम का जुलाहा रहता था । विविध प्रकार के रंगीन और सुन्दर वस्त्र बनाने के बाद भी उसे भोजन-वस्त्र मात्र से अधिक धन कभी प्राप्त नहीं होता था । अन्य जुलाहे मोटा-सादा कपड़ा बुनते हुए धनी हो गये थे । उन्हें देखकर एक दिन सोमलिक ने अपनी पत्‍नी से कहा---"प्रिये ! देखो, मामूली कपड़ा बुनने वाले जुलाहों ने भी कितना धन-वैभव संचित कर लिया है और मैं इतने सुन्दर, उत्कृष्ट वस्त्र बनाते हुए भी आज तक निर्धन ही हूँ । प्रतीत होता है यह स्थान मेरे लिये भाग्यशाली नहीं है; अतः विदेश जाकर धनोपार्जन करुँगा ।  सोमिलक की पत्‍नी ने कहा---"प्रियतम ! विदेश में धनोपार्जन की कल्पना मिथ्या स्वप्न से अधिक नहीं । धन की प्राप्ति होनी हो तो स्वदेश में ही हो जाती है । न होनी हो तो हथेली में आया धन भी नष्ट हो जाता है । अतः यहीं रहकर व्यवसाय करते रहो, भाग्य में लिखा होगा तो यहीं धन की वर्षा हो जायगी। अपना कर्म करते रहो।  सोमिलक---"भाग्य-अभाग्य की बातें तो कायर लोग करते हैं । लक्ष्मी उद्योगी और पुरुषार्थी शेर-नर को ही प...

व्यापारी के पुत्र की कहानी - मित्रसम्प्राप्ति - पंचतंत्र की हिंदी कहानी

व्यापारी के पुत्र की कहानी - मित्रसम्प्राप्ति - पंचतंत्र पुराने समय की बात है एक नगर में सागर दत्त नाम का एक व्यापारी रहता था। व्यापारी के लड़के ने एक बार सौ रुपए मूल्य की एक पुस्तक खरीदी। उस पुस्तक में केवल एक श्लोक लिखा था – जो वस्तु जिसको मिलने वाली होती है, वह उसे अवश्य मिलती है। उस वस्तु की प्राप्ति को विधाता भी नहीं रोक सकता। अतएव मैं किसी वस्तु के विनष्ट हो जाने पर न दुखी होता हूं और न किसी वस्तु के अनायास मिल जाने पर आश्चर्य ही करता हूं। क्योंकि जो वस्तु दूसरों को मिलने वाली होगी, वह हमें नहीं मिल सकती और जो हमें मिलने वाली है, वह दूसरों को नहीं मिल सकती। उस पुस्तक को देखकर सागर दत्त ने अपने पुत्र से पूछा – 'तुमने इस पुस्तक को कितने में खरीदा है ?' पुत्र ने उत्तर दिया- 'एक सौ रुपए में।' अपने पुत्र से पुस्तक का मूल्य जानकर सागर दत्त कुपित हो गया। वह क्रोध से बोला – ‘अरे मूर्ख ! जब तुम लिखे हुए एक श्लोक को एक सौ रुपए में खरीदते हो तो तुम अपनी बुद्धि से क्या धन कमाओगे ? तुम जैसे मूर्ख को मैं अब अपने घर में नहीं रखूंगा।’  सागर दत्त का पुत्र अपमानित होकर...

गजराज और मूषकराज - मित्रसम्प्राप्ति - पंचतंत्र, gajraj or mushakraj mitrasamprapti panchatantra

गजराज और मूषकराज - मित्रसम्प्राप्ति - पंचतंत्र प्राचीन काल में एक नदी के किनारे एक नगर बसा हुआ था। वह नगर सभी के लिए व्यापार का केन्द्र था। अचानक उस नगर के बुरे दिन आने लगे , जब एक वर्ष भारी वर्षा हुई। नदी ने अपनी मर्यादा को तोड़कर अपना रास्ता बदल दिया। लोगों के लिए पीने का पानी न रहा और देखते ही देखते नगर वीरान हो गया। अब वह जगह केवल चूहों के लायक रह गई। चारों ओर चूहे ही चूहे नजर आने लगे। चूहो का पूरा साम्राज्य सा ही वहां स्थापित हो गया। चूहों के उस साम्राज्य का राजा बना मूषकराज चूहा। चूहों का भाग्य देखो, उनके बसने के बाद नगर के बाहर जमीन के अंदर से एक पानी का स्त्रोत भी फूट पड़ा और वह एक बड़ा जलाशय बन गया।  नगर से कुछ ही दूरी पर एक घना जंगल था। जंगल में असंख्य हाथी रहते थे। उन सभी का राजा गजराज नामक एक विशालकाय हाथी था। उस जंगल क्षेत्र में बहुत ही भयानक सूखा पड़ा। जीव-जन्तु पानी की तलाश में इधर-उधर मारे-मारे फिरने लगे। भारी भरकम शरीर वाले हाथियों की तो दुर्दशा हो गई। हाथियों के बच्चे प्यास से व्याकुल होकर चिल्लाने व दम तोड़ने लगे। गजराज ख...

साधु और चूहा - मित्र सम्प्राप्ति - पंचतंत्र की कहानी

साधु और चूहा - मित्र सम्प्राप्ति - पंचतंत्र  वहुत पुराने समय की बात है। महिलरोपयम नामक एक स्थान था। उसके दक्षिणी शहर के पास भगवान शिव का एक मंदिर था। वहां एक पवित्र और महान ऋषि रहते थे और मंदिर की देखभाल करते थे। वे भिक्षा के लिए शहर में नियमित रूप से रोजाना जाते थे, और भोजन के लिए शाम को वापस आते थे। वे अपनी आवश्यकता से अधिक सामग्री भिक्षा में एकत्र कर लेते थे और बाकी का बर्तन में डाल कर गरीब मजदूरों में बाँट देते थे, जो बदले में मंदिर की सफाई करते थे और उसे सजावट का काम किया करते थे। उसी आश्रम में एक चूहा भी अपना बिल बनाकर उसमे रहता था और वह रोजाना कटोरे में से कुछ न कुछ भोजन चुरा लिया करता था। कुछ दिनों बाद जब साधु को एहसास हुआ कि एक चूहा भोजन चोरी करता है तो उन्होंने चूहे को रोकने के लिए सभी तरह की कोशिशें की। उन्होंने कटोरे को काफी उचाई पर रख दिया ताकि चूहा वहां तक पहुँच ही न सके, और यहां तक कि एक छड़ी के द्वारा चूहे को मार भगाने की भी कोशिश की, लेकिन चूहा इतना चालाक था कि किसी भी तरह कटोरे तक पहुंचने का रास्ता ढूंढ ही लेता था और कुछ भोजन चुरा लेता था। एक दिन, एक भ...

एक हसीन लड़की राजा के दरबार में डांस कर रही थी...

एक हसीन लड़की राजा के दरबार में डांस कर रही थी...  किस्मत का अनोखा खेल  एक हसीन लड़की  राजा के दरबार में  डांस कर रही थी.....  [ राजा वहुत बदसूरत था  ]  लकड़ी ने राजा से एक  सबाल की इजाजत मांगी  "राजा ने कहा,   "चलो पूछो"  लकड़ी ने कहा ,  " जब हुशन बंट रहा था  तब आप कहाँ थे ? राजा ने गुस्सा नहीं किया मुस्कराते हुए कहा ,  " जब तुम हुशन की  लाइन में खड़ी  हुशन ले रही थी,  " तो उस समय में ,  " किस्मत की लाइन में खड़ा  किस्मत ले रहा था,  और आज  तुम जैसी हुशन वालियां  मेरी गुलाम की तरह नांच रही है.......  " "इसीलिए शायर खूब कहते है , "हुशन ना मांग  नसीब मांग ए दोस्त, हुशन बाले तो अक्सर नसीब बालों के  गुलाम हुआ करते है ....  "जो भाग्य में है , वह भाग कर आएगा , जो नहीं है वह आकर भी  भाग जायेगा .....!!!!!!!!!!!!!" यहाँ सब कुछ बिकता है , दोस्तों रहना जरा संभल के , बेचने बाले हवा भी बेच देते है , गुब्बारों में डाल के, ...